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पुरवाई

Friday, September 3, 2021

रेत, रेत और रेत


 







बारुदों की गंध में

जब

रेत पर 

खींचे जा रहे हैं

शव

और

चीरे जा रहे हैं

मानवीयता के 

अनुबंध। 

जब 

सिसकियां 

कैद हो जाएं 

कंद्राओं में

और

बाहर शोर हो

बहशीयत का।

उधड़े हुए चेहरों पर

तलाशा जा रहा हो

हवस का सौंदर्य।

जब चीखें 

पार न कर पाएं

सीमाएं।

जब दर्द के कोलाहल में

आंखों में 

भर दी जाए रेत।

जब 

आंधी के बीच

रेत के पदचिन्ह

की तरह ही हो

जीवन की उम्मीद।

जब आंखों में 

सपनों की जगह

भर दी गई हो

नाउम्मीदगी की तपती रेत।

जब चीत्कार के बीच

केवल 

लिखा जा सकता हो दर्द।

मैं

फूलों पर कविता 

नहीं लिख सकता।

रेत में सना सच

और

एक मृत शरीर

एक जैसा ही होता है

दोनों में

जीवन की उम्मीद

सूख जाती है

गहरे तक

किसी 

अगले 

आदि मानव की तलाश के पहले तक।


-------------

(अफगानिस्तान में मौजूदा हालात और वहां की बेटियों पर यह कविता...। )


22 comments:

  1. सच!ऐसी परिस्थिति में जब पूरा विश्व मौन हो,तब तो अगले आदि 'मानव' की तलाश के अलावा चारा ही क्या है😐

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  2. सच!ऐसी परिस्थिति में जब पूरा विश्व मौन हो,तब तो अगले आदि 'मानव'की तलाश के अलावा चारा ही क्या है😐

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  3. जी बहुत आभार आपका... अनीता जी..। साधुवाद

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  4. सामयिक और लाजवाब।

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  5. बारुदों की गंध में
    जब
    रेत पर
    खींचे जा रहे हैं
    शव
    और
    चीरे जा रहे हैं
    मानवीयता के
    अनुबंध।
    मर्मस्पर्शी सृजन संदीप जी ।

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  6. बिल्कुल ये समय नहीं है फूलों पर कविता लिखने का

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  7. बहुत ही भावपूर्ण पंक्तियां

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  8. समसामयिक और सटीक काव्य।यथार्थ का चित्रण करती रचना ।
    मैने

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  9. रेत कि अपनी एक विशात होती है जहां बिछ जाए मृग मरीचिका बना लेती है - परिणाम पाण्डवों कि हार और रक्तरंजित कुरुक्षेत्र का मैदान |
    रेत को हल्के में लेना नीतिगत नहीं होगा।
    रचना बहुत सुन्दर एवं सटीक ।

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  10. इस रचना में अफगानियों का दर्द साफ झलक रहा है ।
    मर्मस्पर्शी रचना

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  11. मार्मिक रचना, अफगानिस्तान में महिलाएं अब विरोध प्रदर्शन कर रही हैं, अपनी आजादी के लिए अब उन्हें खुद ही आगे आना होगा

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